Iran War Hits Condom Price Hike Due to Iran Conflict – ईरान में जारी युद्ध ने अब तक कई उद्योगों को प्रभावित किया है। तेल-गैस के बाद अब इसकी मार एक ऐसे उत्पाद पर पड़ने लगी है जो आम जीवनशैली से जुड़ा है – कंडोम। विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे माल की सप्लाई में आई रुकावट के कारण आने वाले दिनों में कंडोम के दाम बढ़ सकते हैं। युद्ध के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से शिपिंग प्रभावित होने से पेट्रो-केमिकल, अमोनिया और सिलिकॉन ऑयल जैसे जरूरी सामान की आपूर्ति ठप हो गई है। आइए जानते हैं इस पूरे मामले की विस्तृत जानकारी.
कंडोम इंडस्ट्री में क्यों मची बेचैनी?
कंडोम के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले अमोनिया और सिलिकॉन ऑयल की कीमतों में भारी उछाल आने की आशंका है। इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार, अमोनिया के दाम में 40 से 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका सीधा असर सिलिकॉन ऑयल की कीमतों पर भी पड़ेगा, क्योंकि यह भी पेट्रो-केमिकल प्रोडक्ट से बनता है।
इंडस्ट्री के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “किसी को अंदाजा नहीं था कि इस इंडस्ट्री पर भी संकट आएगा। कंडोम अब सिर्फ परिवार नियोजन का साधन नहीं, बल्कि एक लाइफस्टाइल प्रोडक्ट बन चुका है।”
किन चीजों में होगा असर?
लेटेक्स को स्थिर करने और अतिरिक्त प्रोटीन हटाने के लिए अमोनिया का उपयोग होता है, जबकि सिलिकॉन ऑयल कंडोम पर लुब्रिकेंट का काम करता है। इन दोनों ही सामग्रियों की सप्लाई ठप होने से उत्पादन प्रभावित होगा। इसके अलावा, पीवीसी फॉयल, एल्युमिनियम फॉयल और पैकेजिंग मटीरियल की सप्लाई में भी रुकावट आई है।
सरकारी कंपनी भी नहीं है अछूती
केरल की सरकारी कंपनी एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड देश के कुल कंडोम उत्पादन का लगभग 50 फीसदी हिस्सा बनाती है। कंपनी हर साल करीब दो अरब कंडोम का उत्पादन करती है। कंपनी के प्रवक्ता के अनुसार, लॉजिस्टिक्स और शिपिंग में आई बाधा के कारण ऑर्डर पूरा करने में दिक्कतें आ रही हैं।
एचएलएल परिवार नियोजन कार्यक्रम और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के लिए हर साल 100 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के कंडोम मुफ्त उपलब्ध कराती है। यह कंपनी 87 देशों में अपने उत्पादों का निर्यात भी करती है।
युद्ध ने बढ़ाई शिपिंग की मुश्किलें
होर्मुज जलडमरूमध्य से बड़े जहाजों की आवाजाही रोक दी गई है। इस वजह से समुद्री माल ढुलाई में लगने वाला समय बढ़ गया है। अब जहाजों को ‘केप ऑफ गुड होप’ के रास्ते भेजा जा रहा है, जिसमें 15 से 20 दिन अतिरिक्त लग रहे हैं।
वहीं, मिडिल ईस्ट में हवाई क्षेत्र पर लगी पाबंदियों के चलते हवाई माल ढुलाई की क्षमता भी कम हो गई है। इससे तैयार माल के कंसाइनमेंट जमा हो रहे हैं और डिलीवरी में देरी हो रही है।
क्यूपिड लिमिटेड भी परेशान
महाराष्ट्र के मालेगांव स्थित क्यूपिड लिमिटेड भी इस संकट की चपेट में है। कंपनी के सीनियर जनरल मैनेजर आर. बाबू ने बताया, “सिलिकॉन ऑयल और एल्युमिनियम फॉयल की कीमतें काबू में नहीं हैं। लेटेक्स की कीमतें भी बढ़ गई हैं। हम बढ़ी हुई कीमतें वेंडर्स पर डाल नहीं सकते, क्योंकि वे इसके लिए तैयार नहीं हैं।”
उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी अपने कुल उत्पादन का 80 फीसदी रूस, दक्षिण अफ्रीका, यूरोप और ब्राजील को निर्यात करती है, लेकिन शिपिंग वेसल्स न मिलने के कारण एक्सपोर्ट में भी दिक्कतें आ रही हैं।
क्यों चिंतित हैं एक्सपर्ट्स?
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा का कहना है कि कंडोम की कमी या कीमतों में बढ़ोतरी का गंभीर असर हो सकता है। उन्होंने बताया, “नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के अनुसार, अभी सिर्फ 9 फीसदी शादीशुदा जोड़े ही कंडोम को परिवार नियोजन का मुख्य तरीका मानते हैं। ऐसे में कीमतें बढ़ने पर युवाओं और कम आय वाले समूहों में इसका इस्तेमाल और घट सकता है।”
टीनएज प्रेग्नेंसी और एड्स का बढ़ सकता है खतरा
पूनम मुतरेजा ने आगे कहा, “इससे न सिर्फ अनचाही प्रेग्नेंसी का खतरा बढ़ेगा, बल्कि एड्स और अन्य यौन रोगों के फैलने का भी खतरा होगा। सरकार को गर्भनिरोधकों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर देना होगा।”
कब से बढ़ सकते हैं दाम?
फिलहाल यह साफ नहीं है कि उपभोक्ताओं को कंडोम के लिए अतिरिक्त पैसे कब से देने पड़ेंगे। लेकिन इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि अगर युद्ध जल्द खत्म नहीं हुआ और कच्चे माल की सप्लाई सामान्य नहीं हुई, तो कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय है। एक अधिकारी ने कहा, “यह युद्ध जितनी जल्दी खत्म हो, सभी के लिए उतना ही बेहतर होगा।”
ईरान युद्ध का असर अब भारत की कंडोम इंडस्ट्री पर भी दिखने लगा है। कच्चे माल की सप्लाई ठप होने और शिपिंग लागत बढ़ने के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार ने समय रहते कोई कदम नहीं उठाया, तो आने वाले दिनों में कंडोम के दाम बढ़ सकते हैं, जिसका सीधा असर परिवार नियोजन और जन स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर पड़ेगा। फिलहाल, इंडस्ट्री और सरकार दोनों की निगाहें युद्ध के अंत पर टिकी हैं।
