चीन जो कि एशिया के दक्षिण पूर्व में स्थित एक देश है जिसकी कैपिटल बीजिंग है और यहां के अधिकांश लोग बौद्ध धर्म के हैं। आज इस एशियाई देश की जनसंख्या तकरीबन 140 करोड़ से ऊपर है। जैसा कि आप सभी को पता है चीन शुरुआत से ही अपनी लोन डिप्लोमेसी को लेकर विवादों में गिरा हुआ रहा है। चीन शुरुआत से ही छोटा देशों को मदद के नाम पर पहले इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लोन देता है फिर वह उन देशों पर अपना हक जताना शुरू कर देता है जो की चीन का पुराना रवैया है। चीनी ऐसा देश है जिसकी बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था को देखकर भारत, यूरोप और अमेरिका जैसे देश भी आश्चर्यचकित है। चीन के द्वारा उठाया गया कोई भी कम दुनिया में आशंकाओं से भरा हुआ रहा है।
जिस प्रकार भारत की हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं से लेकर साउथ के चाइना सागर तक चीन के इरादे भौगोलिक विस्तार को बढ़ाने के हैं। वहीं दूसरी और सिंगापुर से लेकर सिओल तक, बीआरआई से लेकर न्यूयॉर्क तक चीन की आर्थिक नीतियां विस्तार वादी रही है। चीन अपने विस्तारवाद को पूरा करने के लिए धन को ईंधन के रूप में कई दशकों से काम में ले रहा है जिससे यदि चीन का व्यापार बढ़ेगा तो धन बढ़ेगा, धन बढ़ेगा तो सेना बढ़ेगी और सेना बढ़ेगी तो विस्तारवाद की नीतियां भी बढ़ेगी।
इस देश के सरकारी बैंक जितना लोन नहीं बांटते हैं उससे कई अधिक मात्रा में चीन दूसरे देशों को कर्ज दे देता है। जिनपिंग सरकार की विदेश नीति एक बार फिर से कर्ज को लेकर विवादों में फंस गई है। जिनपिंग सरकार भले ही कर्ज को लेकर विवादों में फंसी हो लेकिन ये चीन की दादागिरी ही है इसके बावजूद भी चीन छोटे देशों को लोन के जाल में फंसाता जा रहा है। चीन के इस जाल में भारत के एशियाई पड़ोसी देश श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश फंसे हुए हैं। लेकिन चीन की ये डिप्लोमेसी अब उनके लिए गले की फांस बनती जा रही है। चीन के साथ हुआ यूं है कि चीन ने जिन छोटे देशों को अपने जाल में फंसाने के लिए लोन बांटे थे, वे सभी देश ऐसे हैं जो वर्तमान समय में लोन चुकाने की हालत में नहीं है। ऐसे में चीन के द्वारा दिया गया पैसा उनके लिए मुसीबत बनता जा रहा है। अब देखना यह होगा कि आखिर चीन इन पैसों को इन देशों से किस प्रकार वसूल करेगा।
हंबनटोटा पोर्ट पर होगा चीन का नियंत्रण
जिस प्रकार चीन ने श्रीलंका को हंबनटोटा बंदरगाह बनाने के लिए लोन दिया था। चीन के द्वारा श्रीलंका में बनाया जा रहा यह प्रोजेक्ट शुरुआत से विवादों में रहा है यदि हम विशेषज्ञों की बात करें तो उनका यह मानना है कि श्रीलंका का यह प्रोजेक्ट उसे किसी प्रकार का फायदा नहीं देने वाला है। कई वैश्विक और आंतरिक कारणों की वजह से श्रीलंका इन दिनों कठिन आर्थिक दौर से गुजर रहा है और यह देश आने वाले कई सालों तक से चीन को कर्ज चुकाने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं है। इसलिए वर्तमान में चीन इस बंदरगाह पर अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए श्रीलंका पर लगातार दबाव बना रहा है। हालांकि अभी कुछ समय पहले चीन के द्वारा श्रीलंका के इसी बंदरगाह पर दो रिसर्च पोत भेजे थे जिस पर भारत सरकार के द्वारा कड़ी आपत्ति जताई गई थी। उसके बावजूद भी उसे रोक नहीं जा सका। इस पर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने कहा कि इससे चीन की नौसेना हंबनटोटा बंदरगाह के जरिए भारत की सबसे नजदीक पहुंच सकती है।चीन ने श्रीलंका के अलावा बांग्लादेश और नेपाल में भी कई प्रोजेक्ट लगा रखें है। चीन ने भारत के एक और पड़ोसी देश मलेशिया को भी लोन दे रखा है।
पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह 40 साल के लिए चीन को लीज पर मिला
वर्तमान हालात को देखते हुए जैसा कि सभी को मालूम है पाकिस्तान के पास इतना पैसा नहीं है। चीन की सरकार के अंतर्गत आने वाली एक कंपनी अगले 40 वर्षों के लिए पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह का मैनेजमेंट पूर्ण रूप से संभालेगी। इस बंदरगाह से आने वाले अधिकतर पैसे का लाभ चीन को मिलता है। क्योंकि इस बंदरगाह को बनाया भी चीन की कंपनी ने ही है तो लाभ भी इस कंपनी के द्वारा ही लिया जा रहा है। ग्वादर बंदरगाह पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य में बना हुआ है परंतु इस राज्य को इस पोर्ट से कोई आर्थिक फायदा नहीं मिलता है। पाकिस्तान सरकार को भी इस पोर्ट से बिल्कुल न के बराबर मुनाफा मिलता है।
आखिर चीन ने कितने देश को दे रखा है कर्ज?
अमेरिका की रिसर्च एजेंसी एडडाटा हाल ही में अपनी रिपोर्ट में बताया कि चीन ने जिस भी देश को लोन दिया है वह सभी देश 80% से अधिक आर्थिक मुश्किलों से गिरे हुए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार चीन के द्वारा बांटे गए लोन में से बकाया कर्ज 1100 अरब डॉलर है जिसमें ब्याज भी शामिल किया गया है। हालांकि रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि कितने देशों ने अभी लोन नहीं चुकाया है। चीन ने लोन के भुगतान में देरी करने पर ब्याज दर को 3% से बढ़कर 8.7% कर दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार 1693 बीआरआई प्रोजेक्ट जोखिम में है और 94 प्रोजेक्ट या तो रद्द कर दिए गए हैं या रोक दिए गए हैं।इस बीच सबसे बड़ी समस्या यह है कि चीन अपना फंसा हुआ पैसा इन देशों से कैसे वसूल करेगा? चीन की आर्थिक हालत पहले से मुश्किल में है और अब ऊपर से यह फंसा हुआ कर्ज चीन के लिए मुश्किल बनता जा रहा है। आखिर में विशेषज्ञों का यह कहना भी है कि चीन कभी नहीं खत्म होने वाला कर्ज ही देता है।
