Iran America War – मिडिल ईस्ट में जारी जंग ने अब वैश्विक बाजारों को हिलाकर रख दिया है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती तनातनी के बीच एशियाई शेयर बाजारों में सोमवार को भारी गिरावट दर्ज की गई। वहीं अमेरिकी बॉन्ड यील्ड आठ महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। ईरान ने रविवार को खाड़ी देशों के ऊर्जा और जल प्रणालियों पर हमले की धमकी दे दी है, जिससे युद्ध जल्द खत्म होने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
बाजारों में भारी गिरावटअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 48 घंटे की अल्टीमेटम के बीच ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपने खाड़ी पड़ोसियों के ऊर्जा और जल प्रणालियों पर हमला करेगा। इसके चलते एशियाई बाजारों में सोमवार को जबरदस्त बिकवाली देखने को मिली।
- जापान का निक्केई: 3.9% टूटा। मार्च महीने में अब तक निक्केई में 13% से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है।
- दक्षिण कोरिया का बाजार: 4.5% लुढ़का। महीने में अब तक करीब 12% की गिरावट दर्ज की गई है।
- एमएससीआई का एशिया-पैसिफिक इंडेक्स (जापान को छोड़कर): 1.2% नीचे आ गया।
तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी
युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव जारी है। सोमवार को शुरुआती तेजी के बाद कीमतों में नरमी आई। ब्रेंट क्रूड 0.2% गिरकर 111.90 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। हालांकि, महीने में अब तक इसमें 55% की बढ़ोतरी हो चुकी है। अमेरिकी कच्चा तेल 98.35 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर रहा।
विशेषज्ञों की राय: 150 डॉलर तक जा सकता है तेल
एएमपी फंड मैनेजर के प्रमुख निवेश रणनीतिकार शेन ओलिवर ने कहा, “युद्ध अभी कई हफ्तों तक चल सकता है और तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। ऊर्जा बुनियादी ढांचे के लगातार नष्ट होने का मतलब है कि सप्लाई को सामान्य होने में लंबा समय लगेगा।”
उन्होंने यह भी कहा कि 1973 में तेल संकट लगभग 4 महीने और 1979 में एक साल तक चला था। इस बार भी कीमतों का असर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है।
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एशिया में ईंधन की कीमतें आसमान पर
एचएसबीसी के विश्लेषकों के मुताबिक, सिंगापुर में जेट फ्यूल की कीमतों में इस साल 175% की बढ़ोतरी हुई है, जो कई दशकों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। एशियाई तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) में 130% का उछाल आया है। शिपिंग में इस्तेमाल होने वाले बंकर फ्यूल की कीमतों में भी भारी उछाल आया है, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है। वहीं उर्वरक की बढ़ती कीमतों से खाद्य पदार्थ महंगे होने की आशंका है।
ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद खत्म
ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ने के कारण बाजारों ने वैश्विक स्तर पर मौद्रिक नीति में और ढील की उम्मीदों को त्याग दिया है। अब ज्यादातर विकसित देशों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।फेडरल रिजर्व से इस साल 50 बेसिस प्वाइंट की दर कटौती की उम्मीदें पूरी तरह खत्म हो गई हैं। यहां तक कि अगला कदम ब्याज दरों में बढ़ोतरी का हो सकता है।
बॉन्ड यील्ड में भारी उछाल
ब्याज दरों को लेकर बदलते रुख का असर बॉन्ड बाजार पर भी पड़ा है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 4.4110% पर पहुंच गई है, जो आठ महीने का उच्चतम स्तर है। युद्ध शुरू होने के बाद से इसमें 44 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हो चुकी है
अमेरिकी डॉलर को फायदा
बाजारों में बढ़ती अस्थिरता का फायदा अमेरिकी डॉलर को मिल रहा है। अमेरिका एक नेट एनर्जी एक्सपोर्टर है, जिससे उसे यूरोप और एशिया के मुकाबले फायदा मिल रहा है, जो शुद्ध आयातक हैं।
- यूरो: 1.1555 डॉलर पर स्थिर रहा।
- डॉलर-येन: 159.15 पर फ्लैट रहा। निवेशक 160.00 के स्तर को लेकर सतर्क हैं, क्योंकि इसके टूटने पर जापान की ओर से हस्तक्षेप की आशंका है।
सोने में मामूली तेजी
कमोडिटी बाजारों की बात करें तो सोने की कीमतों में 0.4% की मामूली तेजी देखी गई। सोना 4,511 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा है। पिछले हफ्ते सोने में गिरावट देखी गई थी, क्योंकि निवेशक वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में बढ़ोतलीय रुख को लेकर दांव लगा रहे हैं।
यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों में भी गिरावट के संकेत
यूरोपीय बाजारों में भी गिरावट के संकेत हैं। यूरोस्टॉक्स 50 फ्यूचर्स और डीएक्स फ्यूचर्स दोनों में 1.2% की गिरावट देखी गई। वॉल स्ट्रीट पर एसएंडपी 500 फ्यूचर्स 0.1% और नैस्डैक फ्यूचर्स 0.2% लुढ़के।
